Silver हुआ बहुत महंगा! क्या Copper बनने वाला है Solar Panel का नया Boss? Experts ने किया बड़ा खुलासा

सोलर इंडस्ट्री इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह है सिल्वर की तेजी से बढ़ती कीमत। हाल ही में सिल्वर की कीमतें लगभग ₹3.1 लाख/kg के ऑल-टाइम हाई के करीब पहुंच गईं, जिससे Solar Panel मैन्युफैक्चरिंग की लागत पर सीधा असर पड़ा है। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि क्या अब सिल्वर की जगह कॉपर सोलर सेल मेटलाइजेशन का नया बॉस बनने वाला है। एक्सपर्ट्स के बयान और इंडस्ट्री के हालिया फैसले इसी दिशा में इशारा कर रहे हैं कि आने वाले सालों में सोलर सेल टेक्नोलॉजी का चेहरा बदल सकता है।

Will solar panels be made of copper

सिल्वर की बढ़ती कीमत और सोलर इंडस्ट्री पर दबाव

पिछले कुछ महीनों में सिल्वर की कीमतों में आई तेज़ उछाल ने सोलर पैनल निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि सोलर सेल में सबसे महंगा कच्चा माल सिल्वर ही होता है। सोलर सेल की फ्रंट और बैक साइड ग्रिड लाइनों में सिल्वर पेस्ट का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे लागत का बड़ा हिस्सा जुड़ा रहता है। 

बड़े स्तर पर उत्पादन करने वाली कंपनियों के लिए यह लागत सीधे मुनाफे को प्रभावित करती है। इसी दबाव के चलते अब कई बड़े सोलर मैन्युफैक्चरर सिल्वर के विकल्प तलाश रहे हैं, ताकि कीमत को कंट्रोल में रखा जा सके और सोलर एनर्जी को किफायती बनाया जा सके। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो सिल्वर पर निर्भरता कम करना मजबूरी बन जाएगी।

Copper की एंट्री और Experts का बड़ा दावा

जर्मनी के ISC Konstanz के को-फाउंडर राडोवान कोपेसेक का मानना है कि कॉपर की ओर तुरंत शिफ्ट करना तकनीकी और आर्थिक दोनों रूप से संभव है। उनके अनुसार, जैसे ही बड़े खिलाड़ी कॉपर मेटलाइजेशन को अपनाते हैं, पूरी इंडस्ट्री उनके पीछे चलती है, क्योंकि सोलर इंडस्ट्री एक “फॉलोअर इंडस्ट्री” है। 

कॉपर स्क्रीन प्रिंटिंग को मौजूदा मैन्युफैक्चरिंग लाइनों में जल्दी लागू किया जा सकता है और इसमें निवेश भी सीमित रहता है। कोपेसेक का यह भी कहना है कि सही तरीके से लागू करने पर कॉपर-मेटलाइज्ड मॉड्यूल की परफॉर्मेंस सिल्वर वाले मॉड्यूल से अलग नहीं होती। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि सिल्वर पूरी तरह खत्म नहीं होगा और लगभग 2 से 3 मिलीग्राम प्रति वॉट सिल्वर की जरूरत बनी रहेगी, क्योंकि यह कॉन्टैक्ट बनाने और डिफ्यूजन बैरियर के लिए जरूरी है।

Efficiency, Reliability और भविष्य की दिशा

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स की एक्सपर्ट निंग सॉन्ग के अनुसार अगर कॉपर पेस्ट अपनाने से थोड़ी बहुत एफिशिएंसी गिरती भी है तो वह कीमत में होने वाली बड़ी बचत के सामने स्वीकार्य हो सकती है। शर्त बस इतनी है कि इससे लॉन्ग-टर्म रिलायबिलिटी पर कोई खतरा न आए। उनका कहना है कि असली फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि मॉड्यूल और सिस्टम लेवल पर उस एफिशिएंसी लॉस की भरपाई कितनी अच्छे से की जा सकती है। 

फिलहाल उनकी टीम सिल्वर के इस्तेमाल को कम करने के लिए शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म दोनों तरह के समाधान पर काम कर रही है। निकट भविष्य में सिल्वर थ्रिफ्टिंग यानी कम सिल्वर के साथ बेहतर डिजाइन सबसे आसान और कम जोखिम वाला रास्ता माना जा रहा है। लंबे समय में वही मेटल सफल होगा जो कम कॉन्टैक्ट रेजिस्टेंस, कम रीकॉम्बिनेशन लॉस, अच्छी कंडक्टिविटी और मजबूत भरोसेमंद परफॉर्मेंस दे सके। कुल मिलाकर संकेत साफ हैं कि कॉपर सोलर सेल इंडस्ट्री का अगला बड़ा स्टार बन सकता है और 2026 इस बदलाव का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।

यह भी पढ़े – 👉 HJT Solar Cells में 63% परफॉर्मेंस गिरावट का चौंकाने वाला कारण सामने आया और उसे ठीक करने का तरीका भी!

Leave a Comment

हमारे WhatsApp ग्रुप से जुड़ें WhatsApp Icon