दुनिया भर में जब भी सोलर एनर्जी की बात होती है तो सबसे पहले सोलर पैनल का नाम सामने आता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक नई खोज ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भविष्य में पारंपरिक सोलर पैनल्स की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी “Supercell” तकनीक विकसित की है जो सूरज की रोशनी को सीधे बिजली में बदलने के बजाय उसे अंदर कैद करके उसकी ताक़त को 6000 गुना तक बढ़ा सकती है। यह खोज केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लाइट टेक्नोलॉजी की पूरी दुनिया को बदलने की क्षमता रखती है।

प्रकृति से आगे निकली विज्ञान की सोच
प्रकृति में पहले से ही ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहाँ रोशनी को बेहद कुशल तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, जैसे पेड़ों में होने वाली फोटोसिंथेसिस, इंसानी आंखों की रेटिना और समुद्री कोरल रीफ्स। इसके बावजूद इंसानों द्वारा बनाए गए सोलर सिस्टम आज भी पूरी तरह से रोशनी का उपयोग नहीं कर पाते। सामान्य सोलर पैनल सूरज की रोशनी का एक हिस्सा बिजली में बदलते हैं और बाकी ऊर्जा गर्मी के रूप में बर्बाद हो जाती है। जैसे ही इन सिस्टम्स पर ज़्यादा लोड डाला जाता है, उनकी एफिशिएंसी गिरने लगती है और मटेरियल खराब होने लगता है।
इसी समस्या को हल करने के लिए भौतिकी के वैज्ञानिकों ने “लाइट को इकट्ठा करने” के बजाय “लाइट को केंद्रित और बढ़ाने” पर काम शुरू किया। उनका लक्ष्य था कि रोशनी की तीव्रता इतनी बढ़ाई जाए कि उससे नई तरह की केमिकल रिएक्शन, अल्ट्रा-फास्ट सिग्नल प्रोसेसिंग और एडवांस ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी संभव हो सके। इसी रिसर्च के दौरान यह नई सुपरसेल संरचना सामने आई, जो आकार में नैनोमीटर स्तर की है लेकिन ताक़त में मौजूदा तकनीकों से कहीं आगे निकल चुकी है।
क्या है Supercell और क्यों कहा जा रहा है इसे “Explosive”
वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, यह Supercell आने वाली सूरज की रोशनी की तीव्रता को लगभग 6000 गुना तक बढ़ा सकती है। जब वैज्ञानिक “एक्सप्लोसिव लाइट” शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो इसका मतलब किसी बम या विस्फोट से नहीं है। यहां बात हो रही है रोशनी की ऊर्जा के अत्यधिक स्थानीय रूप से बढ़ जाने की जैसे माइक्रोस्कोपिक स्तर पर एक साथ हज़ारों सोलर पैनल चालू कर दिए गए हों।
यह Supercell कई खास लेयर्स से बनी होती है, जिन्हें इस तरह डिजाइन किया गया है कि फोटॉन्स बार-बार रिफ्लेक्ट हों, आपस में रेज़ोनेट करें और एक-दूसरे की ऊर्जा को बढ़ाते जाएं। सामान्य तौर पर जहां रोशनी सिस्टम से बाहर निकल जाती है या परावर्तित हो जाती है, वहीं इस संरचना में ऊर्जा अंदर ही जमा होती रहती है। इससे एक बेहद शक्तिशाली “ऑप्टिकल हॉटस्पॉट” बनता है, जिसमें इलेक्ट्रिक फील्ड असाधारण रूप से मजबूत हो जाती है।
भविष्य की ऊर्जा और टेक्नोलॉजी पर इसका असर
इस तकनीक को और बेहतर बनाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भी अहम भूमिका रही है। AI की मदद से वैज्ञानिकों ने Supercell की ज्योमेट्री को इस तरह ऑप्टिमाइज़ किया कि मामूली बदलाव से भी रोशनी की तीव्रता में भारी इज़ाफा हो सके। खास बात यह है कि इतनी ज़्यादा लाइट फोकसिंग के लिए न तो किसी लेंस की ज़रूरत है और न ही मिरर की। यह संरचना फोटॉन्स के लिए किसी बैटरी की तरह काम करती है जो ऊर्जा को थोड़ी देर स्टोर करके नियंत्रित तरीके से रिलीज़ करती है।
जब रोशनी हजारों गुना बढ़ जाती है तो ऐसे केमिकल रिएक्शन संभव हो जाते हैं जो पहले कभी नहीं हो सकते थे। इससे सोलर फ्यूल, अल्ट्रा-सेंसिटिव सेंसर, मेडिकल डायग्नोस्टिक्स और फोटोडिटेक्टर्स जैसे क्षेत्रों में क्रांति आ सकती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इन सुपरसेल्स को मौजूदा नैनो-फैब्रिकेशन तकनीक से ही बनाया जा सकता है, यानी भविष्य में इन्हें सोलर डिवाइस, सेंसर और ऑप्टिकल चिप्स में शामिल किया जा सकता है।
यहां सूरज की ताक़त नहीं बढ़ रही, बल्कि इंसान की क्षमता बढ़ रही है कि वह हर एक फोटॉन का पूरा इस्तेमाल कर सके। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है तो ऊर्जा की दुनिया में एक नया युग शुरू हो सकता है, जहां रोशनी पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर साबित होगी।
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