25 साल बाद भी Solar Panel कबाड़ नहीं बनते! 30+ साल बाद भी 80% पावर देने वाला चौंकाने वाला रिसर्च

सालों से लोगों के मन में यह धारणा बनी हुई है कि Solar Panel 25 साल बाद बेकार हो जाते हैं और फिर उन्हें बदलना ही पड़ता है। आमतौर पर कंपनियां भी 25 से 30 साल की परफॉर्मेंस वारंटी देती हैं, जिससे यह भ्रम और मजबूत हो जाता है कि वारंटी खत्म होते ही पैनल “मर” जाते हैं। लेकिन हाल ही में सामने आया एक नया रिसर्च इस सोच को पूरी तरह से चुनौती देता है और बताता है कि सोलर पैनल की असली उम्र इससे कहीं ज्यादा हो सकती है।

New Research on Solar Panel Aging

30 साल पुराने सोलर पैनल आज भी कैसे दे रहे हैं पावर

स्विट्ज़रलैंड की University of Applied Sciences and Arts of Southern Switzerland में एब्रार ओज़कालय के नेतृत्व में की गई एक स्टडी में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। इस रिसर्च में 1987 से 1993 के बीच लगाए गए छह ग्रिड-कनेक्टेड सोलर सिस्टम्स का विश्लेषण किया गया, जो अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में लगे थे। वैज्ञानिकों ने दशकों के परफॉर्मेंस डेटा के साथ-साथ कुछ मॉड्यूल्स को लैब में भी जांचा, ताकि यह समझा जा सके कि समय के साथ उनकी पावर और अंदरूनी संरचना में क्या बदलाव आए।

इस स्टडी का सबसे बड़ा खुलासा यह था कि 30 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ज्यादातर सोलर पैनल अपनी शुरुआती क्षमता का 80% से अधिक बिजली उत्पादन कर रहे थे। यह नतीजा इसलिए भी खास है क्योंकि आम धारणा के अनुसार इतने पुराने पैनल बहुत कमजोर हो जाने चाहिए थे। इसका सीधा मतलब है कि अगर सोलर पैनल सही क्वालिटी के हों और सही परिस्थितियों में लगाए जाएं, तो वे दशकों तक उपयोगी बने रह सकते हैं।

हर साल कितनी गिरती है क्षमता और असली वजह क्या है

रिसर्च में एक अहम पैरामीटर “परफॉर्मेंस लॉस रेट” को भी देखा गया, यानी हर साल पैनल की क्षमता कितनी घटती है। छहों साइट्स का औसत वार्षिक नुकसान सिर्फ लगभग 0.25% पाया गया, जो पहले के कई अध्ययनों में बताए गए आंकड़ों से काफी कम है। आसान भाषा में कहें तो यह बहुत धीमी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है, जो सोलर पैनल को लंबे समय तक काम करने लायक बनाए रखती है।

स्टडी से यह भी साफ हुआ कि तापमान सोलर पैनल की उम्र में बड़ी भूमिका निभाता है। कम ऊंचाई वाले इलाकों में लगे पैनल ज्यादा गर्म होते हैं और उन पर थर्मल स्ट्रेस अधिक पड़ता है, जिससे उनकी गिरावट थोड़ी तेज हो जाती है। इसके उलट, ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में लगे पैनल अपेक्षाकृत बेहतर परफॉर्म करते पाए गए। यानी सिर्फ पैनल नहीं, बल्कि उनका पर्यावरण भी उनकी उम्र तय करता है।

मटेरियल क्वालिटी, फायदे और आम लोगों के लिए सबक

रिसर्च टीम ने पैनल के “बिल ऑफ मटेरियल्स” यानी इस्तेमाल किए गए सभी कंपोनेंट्स की क्वालिटी पर भी ध्यान दिया। देखने में एक जैसे लगने वाले पैनल, अगर अलग-अलग क्वालिटी के मटेरियल से बने हों तो लंबे समय में उनके नतीजे बिल्कुल अलग हो सकते हैं। खासतौर पर एनकैप्सुलेंट नाम की पारदर्शी परत, जो सोलर सेल्स को सुरक्षा देती है, गर्मी में ज्यादा खराब होती है और इससे धीरे-धीरे अंदरूनी क्षरण शुरू हो सकता है।

इस तरह के लंबे समय के वास्तविक डेटा बहुत दुर्लभ होते हैं, क्योंकि ज्यादातर टेस्ट लैब में तेज़ी से किए जाते हैं। यही वजह है कि यह रिसर्च इतनी अहम मानी जा रही है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी साफ कहते हैं कि हर सोलर पैनल 30 साल बाद भी ऐसा ही परफॉर्म करेगा, यह जरूरी नहीं है, क्योंकि मौसम, इंस्टॉलेशन और मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी सब फर्क डालते हैं।

आम उपभोक्ताओं के लिए इसका सबसे बड़ा सबक यह है कि सोलर पैनल को 25 साल बाद कबाड़ समझने की जरूरत नहीं है। अगर सिस्टम अच्छी क्वालिटी का है, तो इंस्टॉलेशन की लागत निकल जाने के बाद भी कई साल तक यह बिजली के बिल को कम करता रह सकता है। इसके साथ-साथ, लंबे समय तक चलने वाले सोलर सिस्टम पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद हैं, क्योंकि वे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाकर हवा को साफ रखने में मदद करते हैं।

यह भी पढ़े – 👉 Transparent Solar Cell: खिड़कियों से बनेगी बिजली? 35% ट्रांसपेरेंट और कलर-चेंजिंग Solar Technology ने सबको चौंकाया

Leave a Comment

हमारे WhatsApp ग्रुप से जुड़ें WhatsApp Icon