सोलर पैनल से बिजली बनाने में सबसे बड़ी चुनौती गर्मी यानी “हॉट स्पॉट” की समस्या मानी जाती है, क्योंकि तेज धूप और ऊँचे तापमान में पैनल बहुत ज्यादा गरम हो जाते हैं। जब पैनल का तापमान बढ़ता है तो उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और बिजली उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। कई बार यह गर्मी पैनल की उम्र को भी कम कर देती है, जिससे मेंटेनेंस और रिप्लेसमेंट का खर्च बढ़ जाता है। खासकर छतों पर लगे रूफटॉप सोलर सिस्टम और बिल्डिंग-इंटीग्रेटेड सोलर सिस्टम में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। इसी चुनौती को हल करने के लिए वैज्ञानिक लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं और अब Hydrogel Technology को एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।

नई Hydrogel Technology कैसे करती है कमाल
हॉन्ग कॉन्ग पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक खास तरह की हाइड्रोजेल कोटिंग विकसित की है, जो सोलर पैनल के हॉट स्पॉट को प्रभावी तरीके से ठंडा कर सकती है। यह हाइड्रोजेल मुख्य रूप से polyacrylamide नामक पानी को सोखने वाले जेल और hydroxyethyl cellulose से मिलकर बनी है, जिससे इसकी मजबूती और टिकाऊपन बढ़ जाता है। इसके अंदर विशेष कॉटन थ्रेड्स का उपयोग किया गया है, जो पत्तियों जैसी संरचना बनाकर पानी को सबसे ज्यादा गरम हिस्सों तक पहुँचाते हैं। इससे पूरे पैनल में समान रूप से ठंडक बनी रहती है।
इस हाइड्रोजेल की बाहरी परत टेफ्लॉन जैसी पतली और छिद्रदार फिल्म से बनी होती है, जो धूल को जमने से रोकती है और पानी के वाष्पीकरण को नियंत्रित करती है। रिसर्च के अनुसार, यह नई तकनीक सोलर पैनल के तापमान को 16.2 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकती है, जबकि पारंपरिक हाइड्रोजेल केवल लगभग 10 डिग्री तक ही ठंडक दे पाते हैं। यही कारण है कि इस नई कोटिंग को ज्यादा प्रभावी माना जा रहा है।
ज्यादा बिजली, ज्यादा टिकाऊपन और भविष्य की उम्मीदें
इस एडवांस्ड हाइड्रोजेल कोटिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ठंडक बढ़ने से सोलर पैनल की बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 13% तक बढ़ सकती है। रिसर्च में यह भी सामने आया है कि रूफटॉप और BIPV सिस्टम में हॉट स्पॉट के कारण होने वाले लगभग आधे बिजली नुकसान को यह तकनीक कम कर सकती है। हांगकांग और सिंगापुर जैसे गर्म और आर्द्र इलाकों के अध्ययन से पता चला है कि सालाना बिजली उत्पादन में 6 से 7 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी संभव है और निवेश की भरपाई भी 3 से 4.5 साल में हो सकती है।
इसके अलावा, इस नई हाइड्रोजेल में सिकुड़न और क्रैकिंग की समस्या भी कम पाई गई है, जिससे इसकी उम्र पारंपरिक हाइड्रोजेल की तुलना में ज्यादा होती है। वैज्ञानिक अब इस तकनीक को और बेहतर बनाने, उत्पादन लागत घटाने और अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में बड़े स्तर पर परीक्षण करने पर काम कर रहे हैं। आने वाले समय में अगर यह तकनीक बाजार में बड़े पैमाने पर उपलब्ध होती है तो सोलर एनर्जी सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जिससे उपभोक्ताओं को ज्यादा बिजली, कम नुकसान और बेहतर रिटर्न मिलेगा।
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