अब फ्लैट नहीं होंगे Solar Panel! जापान ने 140 साल पुराना नियम तोड़कर बना दिया गोल सोलर सेल

Solar Panel का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में छत पर लगे नीले, चपटे और आयताकार पैनलों की तस्वीर बन जाती है। पिछले 140 सालों से यही डिज़ाइन पूरी दुनिया में सोलर एनर्जी की पहचान बना हुआ था। इसकी शुरुआत साल 1883 में हुई, जब चार्ल्स फ्रिट्स ने पहला सोलर पैनल एक कठोर और फ्लैट प्लेट के रूप में बनाया था, जो सीधे सूर्य की रोशनी पड़ने पर ही सबसे अच्छा काम करता था। लेकिन अब जापान ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है और यह साबित कर दिया है कि सोलर पैनल का फ्लैट होना ज़रूरी नहीं है।

Japan Develops Round Solar panel

कैसे आया गोल सोलर सेल का आइडिया

जापान की Kyosemi Corporation के इंजीनियरों ने यह सवाल उठाया कि असली दुनिया में सूरज की रोशनी कभी भी एक सीधी लाइन में नहीं आती है। रोशनी बादलों से छनकर आती है, कांच, पानी और सड़कों से टकराकर अलग-अलग दिशाओं में फैल जाती है। ऐसे में अगर सोलर सेल सिर्फ सामने से आने वाली रोशनी को ही इस्तेमाल करें तो बहुत सारी ऊर्जा बेकार चली जाती है। इसी सोच से “Sphelar” नाम के गोल सोलर सेल का जन्म हुआ।

इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने वाले इंजीनियर शुजी नकाता ने तय किया कि सोलर सेल को भी हर दिशा से आने वाली रोशनी को पकड़ने में सक्षम होना चाहिए। इस विचार को हकीकत में बदलने के लिए जापान के Japan Microgravity Center (JAMIC) का इस्तेमाल किया गया जो एक पुरानी खदान को रिसर्च टनल में बदलकर बनाया गया था। यहां गिरती हुई वस्तुओं को कुछ समय के लिए भारहीनता जैसा माहौल मिलता है।

गोल सोलर सेल कैसे बनते हैं और कैसे काम करते हैं

Kyosemi के इंजीनियरों ने पिघले हुए सिलिकॉन को सीलबंद कैप्सूल में डालकर इस गहरे शाफ्ट में गिराया। गिरते समय माइक्रोग्रैविटी के कारण सिलिकॉन छोटे-छोटे गोल बूंदों में बदल गया और ठंडा होकर लगभग परफेक्ट गोल मोतियों जैसा बन गया। इसके बाद हर छोटे गोले के अंदर P-N जंक्शन तैयार किया गया, ताकि जब रोशनी उस पर पड़े तो इलेक्ट्रिक चार्ज पैदा हो सके।

हर Sphelar सोलर सेल का आकार सिर्फ 1 से 2 मिलीमीटर का होता है, लेकिन इसका गोल आकार इसे खास बना देता है। यह सीधी, परावर्तित और बिखरी हुई रोशनी को पूरे दिन अलग-अलग कोणों से सोख सकता है। कई ऐसे गोल सेल्स को आपस में जोड़कर छोटे मॉड्यूल बनाए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे फ्लैट पैनलों में किया जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि ये सेल सूरज के सही एंगल का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि कम रोशनी, बादल या छाया में भी काम करते रहते हैं।

भविष्य में कहां और कैसे बदलेगी सोलर एनर्जी

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे वहां भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां फ्लैट पैनल लगाना मुश्किल होता है। ऊंची कांच की इमारतें, बालकनी के किनारे, घुमावदार दीवारें, यहां तक कि पारदर्शी खिड़कियां भी अब बिजली बना सकती हैं। Sphelar सेल्स को पारदर्शी मटेरियल में लगाया जा सकता है, जिससे रोशनी भी आती रहे और बिजली भी बनती रहे।

Kyosemi ने 1998 में अपनी खुद की माइक्रोग्रैविटी लैब बनाई और बड़े पैमाने पर रिसर्च शुरू की। बाद में Sphelar को ट्रेडमार्क के रूप में रजिस्टर किया गया और Sphelar Power Corporation नाम की कंपनी ने इसे प्रोडक्ट्स में बदलना शुरू किया। आज इस तकनीक से चलने वाले छोटे लैंप, गार्डन लाइट और बिल्डिंग एलिमेंट्स तैयार किए जा रहे हैं।

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